आज स्वतंत्रता का इतिहास देश का बच्चा-बच्चा जानता है, इसलिए यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि स्वतंत्रता हमें किन बलिदानों के फल स्वरुप मिली। बल्कि हमें वर्तमान पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना चाहिए कि इस स्वतंत्रता को अपनी आंतरिक चेतना का हिस्सा कैसे बनाएं। कैसे स्वतंत्र चेतना बनें। कैसे अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने वांग्मय को लेकर गौरव का अनुभव करें। अपने समृद्ध इतिहास को तलाशने का प्रयास करें और विस्मृत की गई ऐतिहासिक विभूतियों को अपना आदर्श बनाने की कोशिश करें।
चेतना के स्तर पर जाकर देखें तो भारतवर्ष कभी परतंत्र रहा ही नहीं अगर चेतना के स्तर पर जाकर देखें तो भारतवर्ष कभी परतंत्र रहा ही नहीं। आक्रांताओं ने भारतवर्ष पर आक्रमण करके इस पर कुछ वर्ष तक शासन अवश्य किया, किंतु भारत की स्वतंत्र चेतना को नष्ट करने में सफल नहीं हो सके। यही कारण है कि भारत अपने स्वतंत्रता के मूल्यों को तमाम विरोधाभासों के बावजूद संजोने में कामयाब रहा, बल्कि भारत का एक बड़ा भूभाग उस सांस्कृतिक एकता को भी कायम रखने में कामयाब रहा जो भारत की मूल अवधारणा से विकसित हुई थी।