नीमच। मदर्स डे महज एक तारीख नहीं, बल्कि उस निस्वार्थ प्रेम का उत्सव है जिसे हम 'माँ' कहते हैं। आज मिशन मालवा न्यूज़ उन माताओं की बात कर रहा है, जिनके लिए घर की दहलीज पार करते ही 'ममता' और 'कर्तव्य' के बीच एक बारीक लकीर खिंच जाती है।
**अस्पताल से लेकर सड़कों तक... फर्ज की गूंज:**
हम अक्सर अस्पताल के गलियारों में उन महिला डॉक्टरों को देखते हैं जो पूरी रात दूसरों की जान बचाती हैं, जबकि उनका अपना बच्चा घर पर उनके आंचल का इंतजार कर रहा होता है। हम उन महिला पुलिसकर्मियों को देखते हैं जो तपती धूप में शहर की सुरक्षा का जिम्मा संभाले हुए हैं।
लेकिन इसी कड़ी में एक और अहम तस्वीर है—वह **सफाई मित्र महिला**, जो सूरज उगने से पहले ही हाथों में झाड़ू थामे सड़कों पर निकल आती है। कई बार ऐसी मार्मिक स्थितियां भी सामने आती हैं जब इन माताओं के पास घर पर बच्चे को संभालने वाला कोई नहीं होता, तब वे अपने मासूम को पीठ पर बांधकर या सड़क किनारे सुरक्षित बैठाकर पूरे शहर की गंदगी साफ करती हैं। उनका यह संघर्ष बताता है कि एक माँ अपने बच्चे का पेट पालने और समाज को स्वच्छ रखने के लिए किस हद तक समर्पित हो सकती है।
**त्याग की मूक कहानियाँ:**
पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। चाहे वह डॉक्टर हों, पुलिसकर्मी हों या सफाई मित्र—इन कामकाजी माताओं के पास 'वर्क फ्रॉम होम' का विकल्प नहीं होता। उनकी ड्यूटी 24 घंटे की होती है। एक तरफ समाज की सुरक्षा, सेवा और स्वच्छता का दबाव होता है, तो दूसरी तरफ एक माँ का कोमल हृदय। इन दोनों के बीच सामंजस्य बिठाना ही उन्हें एक साधारण महिला से 'मदर' और फिर 'वॉरियर' बनाता है।
**हमारा संदेश:**
मिशन मालवा न्यूज़ आज ऐसी हर माँ को सलाम करता है जो अपने बच्चों के भविष्य के साथ-साथ समाज के भविष्य को भी गढ़ रही हैं। आज का दिन सिर्फ उपहार देने का नहीं, बल्कि इन कामकाजी माताओं के संघर्ष को सम्मान देने का दिन है।