मनासा | क्षेत्र के किसानों को पर्यावरण अनुकूल और कम लागत वाली खेती के प्रति जागरूक करने के लिए सॉलिडरिडाड संस्था द्वारा एक विशेष मुहिम शुरू की गई है। संस्था द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में साप्ताहिक कृषि चौपाल का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें किसानों को 'पुनर्योजी कृषि' (Regenerative Farming) के महत्व और उससे होने वाले लाभों की व्यावहारिक जानकारी दी जा रही है।
मिट्टी की सेहत सुधारने पर जोर
चौपाल के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। कार्यक्रम में निम्नलिखित प्रमुख विषयों पर मार्गदर्शन दिया गया:
जैविक खाद का उपयोग: वर्मी कम्पोस्ट निर्माण और उसके फायदों पर चर्चा।
संसाधन संरक्षण: प्राकृतिक संसाधनों का सही प्रबंधन और फसल विविधीकरण।
रसायन मुक्त खेती: रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों के प्रति सचेत करते हुए जैविक विकल्पों को अपनाने की प्रेरणा।
पुनर्योजी कृषि के 5 प्रमुख सिद्धांत
विशेषज्ञों ने खेती की इस पद्धति को समझने के लिए पांच मुख्य सिद्धांतों पर विशेष जोर दिया:
न्यूनतम हस्तक्षेप: मिट्टी की जुताई में कम से कम छेड़छाड़ करना।
मृदा आवरण: मिट्टी को हमेशा फसलों या अवशेषों से ढंक कर रखना।
फसल विविधता: एक ही खेत में अलग-अलग तरह की फसलें उगाना।
जीवित जड़ें: साल भर मिट्टी में जीवित जड़ों की मौजूदगी सुनिश्चित करना।
पशुपालन एकीकरण: खेती के साथ पशुपालन का समन्वय करना।
किसानों में उत्साह, सुधरेगा पर्यावरण
इस चौपाल में बड़ी संख्या में स्थानीय किसानों ने हिस्सा लिया। किसानों ने न केवल विशेषज्ञों की बातें सुनीं, बल्कि अपने पारंपरिक अनुभव भी साझा किए। संस्था के प्रतिनिधियों ने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय में वृद्धि करना, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार लाना और पर्यावरण को नुकसान से बचाना है।
किसानों ने नई तकनीकों को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई है, जिससे आने वाले समय में क्षेत्र में जैविक और पुनर्योजी खेती को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
ब्यूरो रिपोर्ट: मिशन मालवा न्यूज़