**नीमच।** जहाँ एक ओर पूरा शहर बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं जिला चिकित्सालय में प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने मानवता और सरकारी सिस्टम दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ **रात 10:00 बजे से लेकर देर रात 1:00 बजे तक** हजारों लीटर पानी व्यर्थ बहता रहा, लेकिन अस्पताल का भारी-भरकम अमला गहरी नींद में सोया रहा।
### **राजेश: वो 'आम आदमी' जिसने सिस्टम की लाज बचाई**
इस घोर अव्यवस्था के बीच अस्पताल के पास ही चाय की दुकान चलाने वाले **राजेश** एक असली नायक (Hero) बनकर उभरे। जब उन्होंने देखा कि घंटों से पानी बर्बाद हो रहा है और अस्पताल का कोई भी कर्मचारी या जिम्मेदार व्यक्ति इसे रोकने नहीं आ रहा, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझी। राजेश ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए खुद आगे बढ़कर उस बहते हुए पानी को बंद किया।
राजेश की इस तत्परता ने न केवल हजारों लीटर अनमोल जल को बर्बाद होने से बचाया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि व्यवस्थाएं सुधारने के लिए ऊंचे पदों की नहीं, बल्कि एक साफ नीयत और जागरूक सोच की जरूरत होती है। आज पूरा अस्पताल परिसर राजेश के इस निस्वार्थ कार्य की सराहना कर रहा है।
### **सिविल सर्जन महेंद्र पाटिल की बेरुखी: आधी रात को फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा**
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद और गंभीर पहलू अधिकारियों का रवैया रहा। जब **पत्रकार चिराग फगवार** ने मौके पर पहुँचकर स्थिति का जायजा लिया और मामले की गंभीरता को देखते हुए **सिविल सर्जन महेंद्र पाटिल** को उनके मोबाइल पर कॉल किया, तो साहब ने **फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझा।** सवाल यह उठता है कि क्या जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी इतने लापरवाह हो सकते हैं कि आधी रात को अस्पताल में हो रही अव्यवस्था पर उन्हें मीडिया या जनता को जवाब देना उचित न लगे? एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी का यह व्यवहार सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरा दाग लगाता है।
### **लापरवाही का जिम्मेदार कौन?**
रात 10 बजे से 1 बजे तक, यानी पूरे 3 घंटे तक पानी बहता रहा, लेकिन अस्पताल में तैनात ड्यूटी डॉक्टर, नर्स या मेंटेनेंस स्टाफ को इसकी भनक तक नहीं लगी—या फिर उन्होंने इसे अनदेखा करना बेहतर समझा। यह प्रशासन की वह 'ओवरफ्लो' लापरवाही है, जिसकी कीमत जनता के टैक्स के पैसे और प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी से चुकानी पड़ रही है।
### **तीखे सवाल जो जवाब मांगते हैं:**
* जब एक चाय दुकान संचालक **राजेश** अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है, तो अस्पताल का पूरा अमला क्यों विफल रहा?
* **सिविल सर्जन महेंद्र पाटिल** ने पत्रकार का फोन क्यों नहीं उठाया? क्या वे अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं?
* क्या उन लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी जो ड्यूटी के दौरान इस बर्बादी के मूकदर्शक बने रहे?
**निष्कर्ष:** आज की यह घटना हमें दो तस्वीरें दिखाती है—एक तरफ **राजेश** जैसा जागरूक नागरिक है जिस पर हमें गर्व होना चाहिए, और दूसरी तरफ वह सुस्त प्रशासनिक सिस्टम है जो फोन उठाने और काम करने से कतराता है। प्रशासन को चाहिए कि राजेश जैसे नायकों को सम्मानित करे और कामचोर अधिकारियों को उनकी सही जगह दिखाए।