नीमच। जिला चिकित्सालय की दहलीज पर कदम रखते ही 'स्वास्थ्य' की उम्मीद जागती है, लेकिन यहाँ का कड़वा सच वाटर कूलर के ढक्कन में छिपा है। जिस मशीन से प्यास बुझाने के लिए मरीज और कर्मचारी पानी पी रहे थे, असल में वह **'बीमारियों का जलपात्र'** साबित हुई है।
### **सफाई की खुली पोल**
मशीन खराब होने पर जब तकनीकी जांच के लिए ढक्कन हटाया गया, तो अंदर का नजारा किसी डरावने मंजर से कम नहीं था। अंदर सालों पुरानी **जमी हुई काई, सड़ा हुआ कचरा और कीचड़** जमा था। यह स्थिति अस्पताल प्रशासन की उस संवेदनहीनता को दर्शाती है, जहाँ इंसानी जान की कीमत शायद कागजी मेंटेनेंस से भी कम आंकी जा रही है।
### **जिम्मेदारों को सीधी फटकार**
क्या जिम्मेदार अधिकारी केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर करने के लिए नियुक्त हैं?
* **सवाल:** अस्पताल के वाटर कूलरों की आखिरी बार सफाई कब हुई थी?
* **जवाबदेही:** अगर इस दूषित पानी से कोई महामारी फैलती है, तो इसका गुनहगार कौन होगा?
जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले इस संस्थान में ऐसी **आपराधिक लापरवाही** बर्दाश्त के बाहर है। अधिकारियों को चाहिए कि वे अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागें और तत्काल दोषियों पर कार्रवाई कर व्यवस्था दुरुस्त करें।
**खामोशी अब समाधान नहीं है; जवाब देना होगा!**