नीमच जिला मुख्यालय पर स्थित जिला चिकित्सालय लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से जिले का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है। मेडिकल कॉलेज आने के बाद यहाँ आई डॉक्टरों की टीम न केवल योग्य और अनुभवी है, बल्कि गंभीर से गंभीर रोगियों का इलाज करने की क्षमता भी रखती है। मगर अफसोस की बात यह है कि अस्पताल में आधुनिक चिकित्सा उपकरणों, पर्याप्त दवाओं और आवश्यक संसाधनों की कमी के चलते यह काबिल डॉक्टरों की टीम भी कई बार कुछ भी नहीं कर पाती है ।
नीमच जिला चिकित्सालय में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति पिछले कई वर्षों से नहीं की गई है। परन्तु मेडिकल कॉलेज के शल्य चिकित्सा, स्त्री रोग, हड्डी रोग, बाल रोग और मेडिसिन जैसे विभागों में डॉक्टरों की मौजूदगी से आम जनता में उम्मीद जगी थी कि अब जिले के मरीजों को इलाज के लिए इंदौर, उदयपुर और अहमदाबाद नहीं भागना पड़ेगा। लेकिन हकीकत यह है कि जब जरूरी संसाधन व दवाएँ ही स्टॉक में उपलब्ध न हों, या जांच के लिए मशीनें खराब पड़ी हों, तो डॉक्टरों की मेहनत और ज्ञान मरीजों तक पहुँच ही नहीं पाता।
डॉक्टरों का कहना है कि “हम मेडिकल कॉलेज में पढ़ाने के साथ यहाँ अपनी पूरी क्षमता से काम करने को तैयार हैं। कई बार मरीजों का इलाज हम आसानी से कर सकते हैं, लेकिन मशीनें नहीं चल रही हों या दवाएँ उपलब्ध न हों तो मजबूरी में हमें मरीज को बाहर रेफर करना पड़ता है। यह हमारे लिए भी निराशाजनक है और मरीजों के लिए भी।”
जिले के ग्रामीण अंचल से आने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज जिला चिकित्सालय को अपनी पहली उम्मीद मानते हैं। यह अस्पताल सरकारी योजनाओं और मुफ्त उपचार सुविधाओं का लाभ लेने का केंद्र भी है। लेकिन एंटीबायोटिक, कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोग की कई जरूरी दवाएँ यहाँ अक्सर उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे में मरीजों को बाहर की मेडिकल दुकानों से महंगी दवाएँ खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कुछ गरीब मरीज आर्थिक तंगी के कारण पूरा कोर्स ही नहीं करा पाते, जिससे उनकी बीमारी और बिगड़ जाती है।
गांव से यहाँ इलाज के लिए आये मरीज कहते है कि यहाँ हमें डॉक्टर अच्छे से देखते है, लेकिन जिन दवाओं का नाम पर्ची में लिखते है, वो अस्पताल में नहीं मिलती, बाहर से खरीदनी पड़ती है / गरीब आदमी इतने महंगे इलाज का खर्च कैसे उठाएगा ?” प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र में भी कई दवाएं उपलब्ध नहीं होती और यह केंद्र भी सीमित समय के लिए ही खोला जाता है /
अस्पताल में सीटी स्कैन मशीन लंबे समय तक बंद पड़ी रहती है, जिससे न्यूरोलॉजी और गंभीर चोट वाले मरीजों को तुरंत निदान नहीं मिल पाता। अल्ट्रासाउंड मशीनें भी अक्सर तकनीकी खराबी के कारण बंद रहती हैं। इमरजेंसी विभाग में वेंटिलेटर की संख्या बेहद कम है। शल्य चिकित्सा के लिए लेप्रोस्कोप जो आज के लिए अत्यंत आवश्यक उपकरण है, वो भी यहाँ नहीं है / जबकि अब तो रोबोटिक सर्जरी का ज़माना आ गया है / आईसीयू का विस्तार तो हुआ है, लेकिन वहाँ आवश्यक मशीनें और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी हमेशा महसूस की जाती है। डायलिसिस सेंटर की मशीनें तो है, पर वे पर्याप्त नहीं हैं, जिससे किडनी रोगियों को हफ्तों तक इंतजार करना पड़ता है। मजबूरी में मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़ता है, जहाँ खर्च कई गुना ज्यादा है।
योग्य डॉक्टरों के बावजूद संसाधनों की कमी से उनकी ऊर्जा पर असर पड़ रहा है। युवा डॉक्टर, जो नई-नई तकनीकों और इलाज की आधुनिक विधियों में माहिर हैं, यहाँ काम करते हुए अक्सर हताश महसूस करते हैं। कई डॉक्टर तो बेहतर संसाधनों की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि “हमारे पास ज्ञान और काबिलियत है, लेकिन साधन नहीं। यह वैसा ही है जैसे एक किसान के पास उपजाऊ खेत हो, लेकिन बीज और पानी न मिले। सरकार को समझना चाहिए कि डॉक्टर तभी परिणाम दे सकते हैं, जब उन्हें जरूरी संसाधन और सहयोग मिले।”
जिले की जनता अस्पताल पर अपनी नाराज़गी व्यक्त करती है। जनप्रतिनिधियों और स्वास्थ्य विभाग से बार-बार मांग की जाती है कि नीमच जिला चिकित्सालय अस्पताल को दवा और उपकरणों से लैस किया जाए। लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिले हैं।
सरकार हर साल करोड़ों का बजट स्वास्थ्य विभाग को देना बताती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस हैं। आखिर वह करोडो रूपए जाते कहा है, अगर नीमच जिला चिकित्सालय को पूरी तरह सक्षम बनाया जाए तो यहाँ के मरीजों को दूसरे शहरों की भागदौड़ से राहत मिल सकती है।
स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि दवाओं की आपूर्ति राज्य स्तर से होती है और कभी-कभी टेंडर प्रक्रिया में देरी या वितरण की समस्या से स्टॉक खाली हो जाता है। वहीं मशीनों की मरम्मत और नई मशीनों की खरीद के लिए बजट स्वीकृति की प्रक्रिया लंबी चलती है। लेकिन सवाल यह है कि जब मरीज की जिंदगी हर पल दांव पर हो, तो प्रशासनिक देरी का खामियाजा जनता क्यों भुगते?
नीमच जैसे जिले के लिए यह बेहद आवश्यक है कि जिला चिकित्सालय को दवाओं, आधुनिक मशीनों और प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ से लैस किया जाए। इसके बिना डॉक्टरों की प्रतिभा और मेहनत व्यर्थ जाती रहेगी।
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि –
1. दवाओं की आपूर्ति व्यवस्था में सुधार किया जाए और स्टॉक की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित हो।
2. सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड, डायलिसिस और वेंटिलेटर जैसी मशीनें तुरंत चालू रखे / शल्य चिकित्सा के लिए आवश्यक उपकरण व लेप्रोस्कोपिक मशीन भी खरीदी जाएं।
3. अस्पताल के बजट आवंटन में पारदर्शिता और तेजी लाई जाए।
4. डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए कामकाजी माहौल बेहतर बनाया जाए। हॉस्पिटल मैनेजमेंट के लिए डॉक्टरों के बजाय गैर-चिकित्सा पृष्ठभूमि वाले पेशेवर प्रबंधक ही सबसे अधिक उपयोगी होते हैं, जो स्वास्थ्य सेवा प्रबंधन में डिग्री (जैसे एमबीए या पीजी डिप्लोमा) होल्डर हो, इन पेशेवरों में वित्त, परिचालन या सामान्य प्रबंधन से संबंधित विविध दृष्टिकोण होते हैं, जो अस्पताल को बेहतर ढंग से चलाने और रोगी सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
नीमच सिविल अस्पताल में डॉक्टरों की काबिलियत पर कोई सवाल नहीं है। यहाँ काम करने वाले चिकित्सक दिन-रात मेहनत करके मरीजों को बेहतर से बेहतर उपचार देना चाहते हैं। लेकिन दवाओं और उपकरणों की कमी ने पूरे सिस्टम को कमजोर बना दिया है।
आज जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और सरकार सिर्फ कागज़ी योजनाएँ न बनाए, बल्कि जमीन पर काम करते हुए अस्पताल को आधुनिक और सक्षम बनाए। तभी जिले की जनता को सही मायने में स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल पाएगा और काबिल डॉक्टरों की मेहनत भी सफल हो सकेगी।
अब समय आ गया है कि जिला चिकित्सालय का पुराना भवन जो जर्जर होकर अपनी उपयोगिता खो चूका है, उसको जमीदोज कर उसकी जगह बहुमंजिला सर्वसुविधायुक्त आधुनिक चिकित्सालय बनाया जाये. जहा जनता को सभी सुविधाएं व चिकित्सक एक जगह उपलब्ध हो, तभी यह जिला चिकित्सालय कहलाने का वास्तविक अधिकारी होगा /